Sri Krishna Song Lyrics (1/6)

Posted: June 17, 2012 in Uncategorized
निराकार ब्रह्म से न होते संतुष्ट कई, चाहते है देखना समीप अपने इष्ट को |
मूर्तियों में मूर्तिमान होके रहू विद्यमान, देता हु समाधान भक्त चित्त अतिशिष्ट को |
लाठी जो टेक टेक चलते पग एक एक, वे भी पहुच जाते है अपने निर्विष्ट को |
निराकार ध्याय या ध्याय साकार रूप, दोनों प्राप्त करते परम पद विशिष्ट को, दोनों प्राप्त करते है अपने अपने इष्ट को |

मात पिता सुत बन्धु सखा कह जोड़े लोग अनेको नाते |
बालक जान झुलाते पलना ठाकुर जानके भोग लगते |
गोकुल में गोलोक के वासी, गोपियाँ बन मेरे पीछे आते |
पार्थ सारथि बन जाता मैं, नेह के नाते निभाते निभाते |
जो मुझको जिस भाव से ध्याते वो मुझको उस रूप में पाते |

प्रेम ही भक्ति है प्रेम ही पूजा, पूर्ण समर्पण मुझको भाये |
प्रेम डगरिया चलके राही मेरी नगरिया तक  आ जाए |
प्रेम मेरे संग करने वाला, मुझ तक पहुचे मुझीमे समाये |

पूजा की विधि जाने न जाने, सेवा में निधि लाये न लाये |
आवाहन के विसर्जन के कोई मंत्र सुनाये या न सुनाये |
प्रेम ही भक्ति है प्रेम ही पूजा पूर्ण समर्पण मुझको भाये |

रूप है अनेक भले जन्म है अनेक मेरे, मुझसे मिलने में अंतर इससे न आये रे |
जो जैसा है भाव लिए भजता है पार्थ मुझे, बदले में वही भाव मुझसे भी पाए रे |
पूजा आराधना करे जो जिस रूप में, वो मेरा दर्शन उसी रूप में पाए रे |
नदियों का नीर जैसे सिन्धु में समाये ऐसे मेरा भक्त अंततः मुझ ही में समाये रे |
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